Thursday, 16 May 2019

अनुपूरक स्वतंत्रता दिवस – २६ मई २०१४

( सर्वाधिकार सुरक्षित – ऋषि बब्बर १६-५-२०१९ )

१५ अगस्त २००० को अपने विद्यालय में स्वतंत्रता दिवस पर भाषण देते समय मुझे अपनी मासूमियत में ज्ञात नहीं था, कि सही मायनों में भारत को स्वतंत्रता प्राप्त ही नहीं हुई है । किन्तु आज मैं भारत का गुप्त इतिहास जानने पश्चात ( जो हमें विद्यालयों में कभी पढ़ाया ही नहीं गया था और न ही हमारे बुजुर्गों को उसका ज्ञान है / था ) और कई तथ्यों के विश्लेषण के बाद, इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि भारत को सच्ची स्वतंत्रता, ५ वर्ष पूर्व - २६ मई २०१४ को ही मिली थी, जब हर सच्चे भारतीय के प्रिय माननीय श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी ने पूर्ण श्रद्धा से भारत के प्रधान मंत्री होने की शपथ ग्रहण की थी और तत्पश्चात उन्होंने लाल किले की प्राचीर से भारत के प्रधान सेवक की भूमिका अदा करने की सौगंध खा ली । २०१४ का वह मनमोहक दृश्य देखें यूट्यूब पर - https://youtu.be/nFzW9UNDKoc?t=648
 
मोदी जी भारत के पहले ऐसे प्रधान हैं जिन्होंने पहली बार लाल किले से बुलेट-प्रूफ काँचका दमन किया, क्योंकि उन्हें पता है कि उनके इरादे क्या हैं और पुराने प्रधान मंत्री भी भली भांति जानते थे कि उनके मन में देश के प्रति भावना क्या है, इसलिए अपनी सुरक्षा की चिन्ता किए बचते फिरते थे ; क्या किसी ने इस बारे में विचार किया है ? इतना ही नहीं लाल किले से उतर कर मोदी जी बच्चों में जो घुल मिल जाते हैं तथा २६ जनवरी को राजपथ पर दूर तक पैदल चलते हैं , ऐसा भी इतने वर्षों में पहली बार हुआ है ।
 
मोदी जी भारत के पहले ऐसे प्रधान हैं जिन्होंने पहली बार २०१६ में अमृतसर के हरमंदिर साहिब के लंगर में क़तारों में बैठी संगत को, हाथों में बाल्टी लिए दाल परोसी । क्या यह एक सेवक की निशानी नहीं ? प्रधान सेवक ने अपनी अवस्था यहाँ बयान कर दी थी । 


मोदी जी भारत के पहले ऐसे प्रधान हैं जिन्होंने पहली बार पिछले ५ वर्षों में कई ऐसे देशों का भ्रमण किया और उनसे भारत का संबंध घनिष्ठ किया । पहले तो हम सोचते रहे कि शायद मोदी जी केवल यूँ ही घूम रहे हैं , किंतु नहीं । जब २०१९ में सभी देश भारत के साथ खड़े दिखे और अकेला पाकिस्तान अलग-थलग रह गया तो ज्ञात हुआ की कहानी तो कुछ और ही है । देश की सुरक्षा को प्रबल होते देख अति प्रसन्नता हुई । उरीऔर परमाणु चलचित्र देखने बाद तो दिल बाघ-बाघ हो गया तथा फ़िल्म ताश्केंट फाइल्समें कई भेद और खुले और पता चला कि लाल बहादुर शस्त्री को किसने ज़हर दिया ।
दक्षिण के महानायक एन.टी.आर पर बनी 2 फिल्मों में से दूसरा भाग 'महानायकुडु' तो एक अद्भुत चलचित्र है जिसमें दिखाया गया कि कैसे सर्कार गिराई जातीं थीं और उन्हें कौन गिराया करता था ।
  
 
 

अंतर्राष्ट्रीय जगत में योग एवं स्वास्थ्य को एक विशेष स्थान दिलाना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है । इसका प्रमाण है कि सन्युक्त राष्ट्र संघ ने २१ जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित कर दिया है । इतना ही नहीं बल्कि सन्युक्त राष्ट्र को हिंदी वेब्साइट बनाने पर भी मजबूर कर दिया, जिससे हिंदी भाषा का मान बढ़ा‌ है । http://in.one.un.org/hindi/
जिस राजन की नीयत स्वच्छ हो और अंतर मन में ईमानदारी का दीप सदा जगता हो, वही अपनी प्रजा के विषय में सही मायनों में विचार कर सकता है और आधुनिक चोर-डाकुओं के महलों में ६७ वर्षों से जमा काले धन को राख कर सकता है । यह हिम्मत किसी कायर अथवा डरपोक मंत्री में कदापि नहीं हो सकती । 

एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी जी, जो कि भारत के प्रथम ऐसे प्रधान मंत्री हैं, जिनका जन्म स्वतंत्र भारत में हुआ है और संभवतः इसी कारणवश उनकी सोच भी स्वतंत्र एवं उच्चतम श्रेणी की है । मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि मोदी जी भारत को परमात्मा द्वारा दिया गया वरदान हैं, एक अद्भुत भेंट हैं । 
 
भारत देश तड़प उठा था एक ऐसे धनी को जो विश्व में इसे इसकी खोई पहचान वापस दिला सकता और वह इस भूमि को मोदी जी के रूप में प्राप्त हो गया । पहले किसने विचारा था कि भारत अपने बल पर अपने अभियंताओं की सहायता से एक ऐसी खूबसूरत रेल-गाड़ी का निर्माण कर लेगा जो विश्व-स्तरीय होगी – वंदे-भारत एक्स्प्रेस या ट्रेन-१८ इसका उदाहरण है ।
२०१४ से पहले तो हम बस दो दिन झंडा वंदन करके और रफ़ी साहब के देशभक्ति गीत सुन कर समझ लेते थे कि बस इससे ज़्यादा और क्या है; लेकिन आज परिप्रेक्ष्य कुछ भिन्न है । वर्ष में प्रतिदिन स्वतंत्रता दिवस कैसे मनाया जा सकता है यह हमें माननीय मोदी जी ने सिखाया है । आज जो एक सच्चा भारतीय है उसे अपने चौरंगे-ध्वज पर गर्व महसूस होता है । जी हाँ - चार रंग , तिरंगा नहीं परंतु भारत का ध्वज चौरंगा है । न जाने क्यों अशोक चक्र का नीला रंग हम गिनती में नहीं लेते ? क्या हम अशोक-चक्र का सम्मान नहीं करते ? क्यों हम विस्मरण कर देते हैं कि अशोक-चक्र के बिना भारतीय ध्वजा पूर्ण नहीं है।
 
इतिहास में वीरों ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए बलिदान दिए , हमने बहुत सुना और पढ़ा , अनेकों कथाएं और कविताएँ उन पर लिखीं गईं ; किंतु १९४७ से २०१४ तक क्या तमाशा चल रहा था ?
क्यों भरत एक विकसित देश ना बन सका
?
क्या हम हर बार जनसंख्या का बहाना देते रहेंगे
?
लोग विदेशों में जाकर बसना एक बड़ी उपलब्धि मानते थे । यही विचार करते थे कि मेरा बच्चा विदेशों में जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करे तथा अपना जीवन बसर करे
, हालांकि सारा ज्ञान भारत से ही दुनिया भर में फैला था और है। किंतु २०१४ से २०१९ तक इस विचार-धारा में एक आक्रामक विरुद्धता देखी गई है । अब कई ऐसे लोग हैं जो की जागृत हैं , क्योंकि उन्हें सही समाचार मिलते हैं और वे भारत देश की प्रगति में अपना योगदान देना चाहते हैं । मोदी जी ने हमें यह सीख दी कि आज़ादी को कायम कैसे रखा जाए , उसे तंदुरुस्त कैसे बनाया जाए । आज हमारे अभियंताओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि हम विश्व गुरु हैं - केवड़िया गांव में स्थित, लौह-पुरुष सरदार पटेल की १८२ मीटर ऊंची , विश्व की सर्वोच्च -एकता की प्रतिमाइस बात का प्रमाण है । मैंने खुद इस प्रतिमा का अनुभव किया है मित्रों – आंखों देखी बात है, कोई स्वप्न नहीं । जिन्होंने देखा है , वे जानते हैं ; जो लोग सैर नहीं करते और घर बैठे केवल विपक्ष की बातें सुनते रहते हैं उन्हें क्या जानकारी इस बात की । जो पर्यटक पहले अमेरिका की लिबर्टी या फ्रांस का टावर देखने को उत्सुक था , आज वह मेरे भारत में एकता की प्रतिमाका दृश्य देखने को व्याकुल है और शाम ७ बजे प्रतिमा पर दृश्यमान होने वाले लेज़र-लाइट शो का आनंद भी उठाता है ; फिर चाहे वह किसी और देश का ही क्यों न हो । यह तो बस एक उदाहरण है , एक प्रारम्भ है ऐसी और कई अद्भुत भारतीय अभियंताओं की सिद्धि का । अभी तो कश्मीर में विश्व का सबसे ऊंचा रेल-सेतु बन रहा है । अंतरिक्ष हो , विज्ञान हो , देश की सुरक्षा की बात हो , भारत में निर्मित विश्वस्तरीय वंदे-भारत एक्स्प्रेस हो , बच्चों के संग परीक्षा पर चर्चा हो , रेडियो पर मन की बात हो , मोबाइल फोन का भारत में पूर्णतः निर्माण हो या किसी बाहुबली चलचित्र की संपन्नता हो – एक बात तो सत्य है की देश पहले से कहीं ज़्यादा फल-फूल रहा है और यह सब कुछ उसी अर्थव्यवस्था से बना है जिसे कुछ लोगों ने अपने बिस्तरों के गद्दों में दबा रखा था ; लेकिन कोई ज्ञानी ही ऐसा विचार करेगा ।
 
परंतु जिन्होंने आँखों पर नकारात्मक ऐनक पहनी हुई है तथा कुछ भारत-विरोधी ऊर्जाएं , देश की उन्नति से नाखुश हैं । उनके मन में तो बस यही उदासी छाई है कि वे अब पहले की तरह रुपए को बोरिओं में दबा कर व छुपा कर नहीं रख सकते और केवल इस एक बात को लेकर आज वे सभी रावण के समान मोदी जी के विरुद्ध खड़े हैं और उन्हें गालियाँ दे रहे हैं ; तथा ऐसा कर वे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी चला रहें हैं । ऐसे निन्दकों को कुछ अच्छा दिखता नहीं और ना ही इन्हें परमात्मा का भय है । यह तो काला-बज़ारी और चोर-बज़ारी में जीवन व्यतीत करने को ही सुख मानते रहे । जिस हृदय पर अंधकार की कालिक चढ़ जाती है और ईमानदारी और नम्रता लुप्त होत जाती है उन्हें मोक्ष प्राप्त होना असम्भव सिद्ध होगा । 

निन्दा के संदर्भ में संत कबीर की यह वाणी उत्तम है - 

निन्दक नियरे राखिए , आंगन कुटी छवाय ।
बिन पानी साबुन बिना
, निर्मल करै सुभाय ॥ १ ॥

निन्दक दूरि न कीजिए , दीजै आदर मान ।
निर्मल तन मन सब करै
, बकै आनही आन ॥ २ ॥

दोष पराया देख करि , चले हसंत हसंत ।
अपने याद न आवईं
, जा का आदि न अन्त ॥ ३ ॥

जो कोइ निन्दै साधु को , संकट आवै सोइ ।
नरक माहिं जनमै मरै
, मुक्ति न कबहूं होइ ॥ ४ ॥ 

यही वह आदर्श हैं जिसे मोदी जी ने भली-भांति अपने जीवन में धारा है और वे कई बार यह कहते भी हैं कि उन्हें अपनी आलोचना बहुत प्रिय है तथा लोकतंत्र में तो घोर-आलोचना होना अनिवार्य है । यह सब बातें वह दूरदर्शन पर एक मुस्कुराहट के साथ कहते हैं । जब मोदी जी हंसते हैं तो ऐसा लगता है मानो कोई फ़रिश्ता मुसकुरा रहा हो और वह देशवासियों से कह रहा हो कि घबराओ नहीं मैं हूँ ना। 



मतदान के इस माहौल में मोदी जी को इतना आश्वस्त देख कर अति प्रसन्नता होती है । बातें तो और भी कई हैं किंतु अपनी बात को पूर्ण- विराम देकर यहीं समाप्त करता हूँ इस पंक्ति के साथ – 

अबकी बार फिर मोदी सरकार
हर बार मोदी सरकार
पप्पू डब्बू कोई नहीं यार
जीवन भर मोदी सरकार

अंत में अटल जी के दो शब्द याद आ गए –
‘…कमल खिलेगा...
... और मैं कहता हूँ ... कमल खिल चुका है
इस लेख को आपने अंत तक पढ़ा, इस बात के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद । 

ऋषि बब्बर
१६ मई २०१९
, ७:५५
मुम्बई
, भारत

(Copyright Protected Content - Rishi Babbar 16-5-2019)
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Friday, 18 January 2019

उरी - चलचित्र समीक्षा


ऋषि बब्बर द्वारा लिखित | १९ जनवरी २०१९

 ॥ उरी - अति उत्तम चलचित्रम्  

 
...युँ तो मैं हर चलचित्र का विश्लेशण अथवा समीक्षा नहीं लिखता, परन्तु जब फ़िल्म इतनी दमदार और जोशीली हो, तो मेरी उंगलियाँ संगणक के कुंजीपटल पर चलने को आतुर हो जातीं हैं ।
उरी फ़िल्म देखने पश्चात दर्शक के हृदय में देशभक्ति की भावना प्रबल हो उठती है एवं जय हिन्द’, ‘वन्दे-मातरम्के नारे पुकारने को जी करता है ।
 
११ जनवरी २०१९ से चित्रालयों में प्रदर्शित यह फ़िल्म, २८-२९ सितम्बर २०१६ में पाकिस्तान को दिए गए करारे जवाबी आक्रमण पर आधारित है । १८ सितम्बर २०१६ को प्रात: ५:३० बजे पाकिस्तान की ओर से ४ आतंकिओं ने भारतीय सीमा में कश्मीर के उरी क्षेत्र में प्रवेश कर, १९ निद्राकृष्ट भारतीय सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था – जिसके फल स्वरूप भारत की ज़िम्मेदार सरकार ने ऐसा कठोर निर्णय लिया । 
 
उरीजैसी एक विश्वस्तरीय फ़िल्म का निर्माण कर निर्माता रौनी स्क्रूवाला और निर्देशक आदित्य धर ने एक अविश्वस्नीय कार्य कर दिखाया है, जोकि अतुल्य है । सामान्यत: भारतीय चलचित्र उद्योग जगत में ऐसी फ़िल्में बहुत ही कम बनतीं हैं जिनमें किसी भी विभाग में कोई भी कमी ना हो । ऐसा प्रतीत ही नहीं होता कि यह निर्देशक आदित्य धर की पहली फ़िल्म होगी!
 
आदित्य धर जी का निर्देशन एवं शाश्वत सचदेव का उपयुक्त संगीत और परिप्रेक्ष्य गीतों ने इस फ़िल्म को भारतीय फ़िल्म जगत का एक अन्मोल रत्न बना दिया है जो आज हम सिनेमाघरों में बड़े गर्व से अनुभव कर सकते हैं । निश्चित रूप से यह फ़िल्म राष्ट्रीय पुरुस्कार की हक़दार है । क्योंकि हमें ज्ञात है कि यह एक सच्ची घटना पर आधारित है इसलिए इसे परदे पर छायांकित करने हेतु किसी कहाँनी की आवश्यक्ता थी, जिसे आदित्य जी ने बहुत ही उमदा तरीके से पिरोया है ।
 
 फ़िल्म में गीत और परिप्रेक्ष्य संगीत का निर्माण किया है शाश्वत सचदेव ने । सभी ५ गीत अति मधुर हैं और मुझे अत्यंत ही प्रीय हैं तथा सभी गीत फ़िल्म के परिप्रेक्ष्य में हैं । आप अभी गीतों को सुनने हेतु कृपया यहाँ जाएं : https://gaana.com/album/uri-the-surgical-strike ...
 
प्रारम्भ से अंत तक यह फ़िल्म दर्शकों को बांधे रखती है तथा दर्शक अपनी कुर्सी पर टस से मस नहीं होते; सिवाए अंतराल के । उरी चलचित्र का चित्रण मुम्बई और सरबिया देश में किया गया है, जहाँ पर कश्मीर जैसी वादियाँ, गुफ़ाएं , झील व नदी आदि हैं । फ़िल्म के दृश्य मितेश मीरचंदानी द्वारा छायांकित हैं अथवा शिवकुमार पणिकर का सम्पादन पूर्ण्त: तीक्षण है। इस फ़िल्म का छायांकन जून २०१८ से सितम्बर २०१८ के बीच हुआ । मुख्य भूमिका के लिए विकि कौशल ने ५ महीने शारीरिक अभ्यास किया तथा मुम्बई के जल सेना विभाग में एक फौजी समान बंदूक चलाने की भी ख़ास सीख गृहण करी । अन्य कलाकारों की सिख्या भी मुम्बई में नेवी नगर में हुई ।  
 
उरीके निर्माण में कुल रूपए २५ करोड़ की पूंजी क्षय हुई है और अब जब आप यह लेख पढ़ रहे हैं तो यह १०० करोड़ से कहीं अधिक का आंकड़ा पार कर चुकी होगी । फ़िल्म का निर्माण रौनी जी और उनकी आर. एस. वी. पी मूवीज़ द्वारा किया गया है एवं इसे विस्त्रित किया है ज़ी स्टूडिओज़ ने । उरी लगभग सवा दो घंटे लम्बी है ।
उरीचलचित्र के पात्रवर्ग इस प्रकार हैं:-
विकि कौशल – मेजर विहान सिन्ह शेर्गिल
परेश रावल – गोविंद भारद्वाज 

यामी गौतम – पल्लवी शर्मा
मोहित रैना – मेजर करण कश्यप
मानसी पारेख – नेहा कश्यप
कीर्ती कुल्हारी – कप्तान सीरत कौर 
रजित कपूर – प्रधान मंत्री मोदी
योगेश सोमन – रक्षा मंत्री मनोहर परिकर
आदि... ।
 
सारांश में कहाँनी कुछ इस प्रकार है –
भारतीय थल सेना में मेजर विहान शेर्गिल एक निडर फौजी हैं जो अपनी माता जी, जिन्हें भूलने की बीमारी है, का ख्याल रखने हेतु सेना से जल्द ही निवृत्त होना चाहते हैं । 
 
परंतु जब प्रधान मंत्री महोदय इस बारे में प्रबुध्द होते हैं तो वे मेजर शेर्गिल, जोकि पहले मयन्मार सीमा पर स्थित थे, का तबादला दिल्ली में करा देते हैं । मेजर विहान की बहन नेहा, उनके पति मेजर करण कश्यप और बेटी सुहानी के साथ सुखमय जीवन व्यतीत करती हैं। 
 
फ़िर समाचार आता है कि उरी कश्मीर में एक आतंकी हमले में १९ सेना के जवान वीरगति को प्राप्त हो गए, जिसमें मेजर करण भी शामिल थे । पाकिस्तान के ऐसे कायरतापूर्ण कदम पर सभी जवानों का ख़ून खौल्ता है और भारत मूँह तोड़ जवाब देने की तैयारी करता है । ठीक ११ दिनों में उरी क्षेत्र से भारतीय सेना, मेजर विहान के नेतृत्व में, पाकिस्तान अधिवासित कश्मीर में २९ सितम्बर रात्रि २.३० बजे घुस कर, आतंकीय संगठनों के अड्डों को तबाह करती है । 
 
फ़िल्म के दौरान हमे कई बातें सीखने मिलतीं हैं जैसे कि छोटे-ड्रोन जहाज़ो का उपयोग और इसरो द्वारा उपग्रह से सांझा की गयी जानकारी, आदि ।
 

 उरी के चर्मोत्कर्श में सिनेमा घरों में खूब सिटियां बजतीं हैं जहाँ हवाबाज़ कप्तान सीरत कौर जवानों को बचाने हेतु हेलिकौप्टर से, पाकिस्तानियों पर मशीन गन से गोलियों की बौछार करती है । 
 
इस फ़िल्म को एक कहाँनी मे पिरोना आदित्य जी के लिए कोई आसान काम नहीं था । जब वे २०१७ में सर्वोच्च सेना अधिकारी के पास गए थे, तो उन्होंने आदित्य को बताया की उनसे पहले भी कई लोग आए थे यह फिल्म लेकर , किंतु किसी के पास अच्छी कहाँनी नहीं थी । 
 
पट्कथा, संवाद व लेखन का सबसे अच्छा हिस्सा यह रहा कि यह आपका ख्याल कहीं और जाने नहीं देता ( जैसे कि मोबाइल फोन, आदि ) और आप पात्रों से जुड़े रहते हैं और उनकी पीड़ा महसूस कर सकते हैं। 
 
फ़िल्म में ऐसे कई ध्यान आकर्शित करने वाले क्षण हैं कि दर्शक बिना पल्कें झप्काए देखते व सोचते रहते हैं कि,  अब क्या होगा – हालांकि पता है कि सच में क्या हुआ था । उरीचलचित्र में सभी कलाकारों ने उत्कृष्ट कला का नमूना प्रस्तुत किया है, जिससे नए अभिनेता सीख ले सकते हैं । 
 
इस फ़िल्म में देशभक्ति की भावना बहुत गहराई में छुपी हुई है, जिसे सभी दर्शकों ने सराहा है। मैं अपने सह-देश्वासियों से आग्रह करूंगा कि यदि आप अपनेआपको भारतीय कहल्वाने का गौरव महसूस करना चाहते हैं, तो आपके लिए उरीचलचित्र चित्रालय में देखना अत्यंत ही अनिवार्य है । 
वैसे आपकी जानकारी हेतु यह बता दूँ कि इस फ़िल्म की नकली प्रतिलिपि इंटर्नेट पर मौजूद नहीं है, क्योंकि यह नया हिंदुस्तान है, यह टौरेंट में घुसेगा भी और पाइरसी रोकेगा भी ।



इस समीक्षा को पूर्ण पढ़ने हेतु पाठक को मेरा असीम धन्यवाद ।

Howz the जोश ?
...High Sir
Howz the जोश ?
...High Sir
जय हिन्दजय हिन्द
जय हिन्दजय हिन्द
॥ वंदे-मातरम् ॥
http://ऋषीबब्बर.भारत
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Thursday, 3 January 2019

True Home...

Sooner or later we will realise that there is no place on this planet that we call – HOME…!!
 
The True home is one where we have ‘everything’ and the resident does not need to leave the place ever to get anything from ‘outside.’
 
True home is one which is beyond time, matter and space in the highest realms of consciousness.
 
True home is one which is not a rented house; from where no one can kick us out of ever for eternity.
 
True home is in the lap of the creator of the universe, the divine ocean of love, peace and bliss which is truly everlasting.

-@Rishi_Babbar, 3 January 2019, Mumbai, India

Tuesday, 25 December 2018

BIRTHDAY of the ‘AVATAR’ of GOD

“If we can't reach our destination by simply reciting a railway or airways timetable,
then how can we reach our true house of Lord by merely reading a Holy book??!!

If we can't satisfy our hunger by simply reading the recipe book daily,
then how can we satisfy the urge of our soul to meet its beloved
Lord by reading spiritual scriptures day and night??!!

If we can't cure our bodily diseases by only reading the prescriptions by the Doctor or books of medical science regularly,
then how can we cure the disease of illusion from our mind and soul by every day repeating the books by the ‘Divine Doctors’ like a parrot??!!

And last but not the least...

If can't become a scientist by never going to school ever but only celebrating the ‘Birthday of Einstein’ every year,
then when and how can we ourselves become divine, holy, spiritual or delete our karma by merely celebrating the ‘Birthday of the Great Saint(s) - The AVATAR(s) of GOD’??!!
 

Why do we take life for granted??

Why aren't we truly serious about our soul’s ultimate evolution in the creation??

Why aren’t we planning to get out of this foolish domain of time, matter and space and the futile worldly pursuits??

We are grownups … not kids…
PONDER…!!”


-@Rishi_Babbar, Mumbai, India,
25 December 2018, 23:40 hrs IST