Thursday, 8 February 2018

पदमावत - चलचित्र समीक्षा

ऋषी बब्बर द्वारा लिखित ८ फरवरी २०१८

“चिंता को तलवार की नोक पे रखे
वो राजपूत ...
रेत की नाव लेकर समंदर से शर्त लगाए
वो राजपूत ...
और जिसका सर कटे
, फिर भी धड़ दुश्मन से लड‌ता रहे
वो... राजपूत ...”
पदमावत चलचित्र से रतन सिंह का यह संवाद काफ़ी दिलचस्प है और इसी प्रारूप में एक और संवाद जो पहले हम देख व सुन चुके हैं किसी और फ़िल्म में वह है...

“जो तूफ़ानी दरिया से बगावत कर जाए
वो इश्क...
भरे दरबार में जो दुनिया से लड़ जाए
वो इश्क...
जो महबूब को देखे तो ख़ुदा को भूल जाए
वो इश्क...”

...कुछ याद आया ?

जी हाँ ....

...यह मस्तानी का संवाद है बाजीराव मस्तानी’ चलचित्र से और यही होती है एक निर्देशक की पहचान । हर फिल्म बनाने वाले का अपना एक सांचा होता है, एक निराला ही ढंंग होता है, तरीका होता है, काम करने का । जिसमें से यह ज्ञात होता है कि यह किसकी कला है । संजय भंसाली जी की कोई भी फ़िल्म खुश्हाली में तो अंत नहीं होती परंतु बहुत कुछ सिखा देती है उनकी कला हमें जीवन के उपलक्ष में; फ़िर चाहे वह देवदास हो, ‘बाजीराव मस्तानी हो , आदि । मैं यहाँ पदमावत की कहानी सारांश तथा कुछ अन्य तथ्य प्रस्तुत करना चाहुंगा । आगे बढ‌ने से पहले मैं यह स्पष्ट कर दूं कि सभी ने फिल्म पर जो मेहनत की है उस्का मैं पूर्ण हृदय से सम्मान करता हूँ, भंसाली परिवार को बधाई – कि इतनी कठिनाइयों के पश्चात अंतत: उनकी फ़िल्म प्रदर्शित हुई ।
फिल्मानुसार सारांश में कहें तो होता यह है कि महारावल रतन सिंह (शाहिद कपूर) को रानी पदमावती (दीपिका पदुकोने) से प्रेम होता है, वे उन्हे ब्याह कर चित्तौड़ लाते हैं । रतन सिंह के राज-गुरू (आयाम मेहता) , रानी को देखते हैं तो वे उन पर मोहित हो जाते हैं और इन दोनो को रात्रि को एकांत में छुप कर प्रेम-विलीन अवस्था में देख लेते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप रतन सिंह रानी के कहने पर भ्रष्ट राज-गुरू को देश निकाला दे देते हैं । राज-गुरू दिल्ली पहुंच कर अलाउद्दीन खिल्जी (रणवीर सिंंह) से जा मिलता है और अलाउद्दीन को रानी पदमावती की सुंदरता का वर्णन करता है । 

अलाउद्दीन के मन में इस बात को बो देता है कि अगर उसे दूसरा सिकंदर बनना है तो उसे पदमावती को हासिल करना अति आवश्यक है क्योंकि वह साक्षात माया है और वही उसके किस्मत के किवाड खोलेगी । 
फ़िर अलाउद्दीन चित्तौड़ कि ओर चल देता है किन्तु गढ में प्रवेश नहीं कर पाता और ६ महीनों तक मैदान में डेरा डाल जम जाता है, दीपावली से होली तक । फिर अलाउद्दीन चाल चलता है  कि धोके से रतन सिंंह को अपहरण कर दिल्ली ले जाता है । फिर पदमावती को दिल्ली लाने का छल करता है, लेकिन उससे नहीं मिल पाता क्योंकि अलाउद्दीन कि बीवी मेह्रून्निसा (अदिति राओ), रतन सिन्ह और पदमावती को सुरंग के रास्ते भगाने में सहायता करती है ।

फ़िर दोबारा दुगुनी ताकत से पदमावती को पाने अलाउद्दीन चित्तौड़ आता है अपनी सम्पूर्ण सेना व अस्त्र-शस्त्र लेकर । प्रभात होते ही अलाउद्दीन प्रहार कर देता है और चित्तौड़ पर आग के गोले बर्साता है, जिससे किले की दीवारें कांप उठतीं हैं ।



सूर्य चढ्ते ही रतन सिन्ह अपनी सेना ले गढ से उतर रण भूमी पर आता है, किंतु अकेले ही अलाउद्दीन से लड्ने लगता है ।
अब अलाउद्दीन और रतन सिन्ह की इस व्यक्तिगत लडाई में जब अलाउद्दीन के हाथ से तलवार एवं सर से ताज गिरा देता है रतन सिंह और अलाउद्दीन हार का स्वाद चख़ता है तो मलिक गफूर (जिम सर्भ), रतन सिंह की पीठ पर तीरों की बौछार करता है और धोखे से रतन की हत्या कर देता है । 
फ़िर सेनाएं आपस में गुत्थम-गुत्था हो जातीं हैं । इसी बीच अलाउद्दीन गढ़ पर चढाई कर जाता है, इस उम्मीद में की रानी को हासिल कर ले; किंतु वह अंजान मूर्ख नहीं जानता था कि रानी पदमावती संग सभी स्त्रियां स्वरक्षा हेतु पवित्र अग्नि में खुद को सौंप कर सर्वोच्च बलिदान दे देंगी ।



फ़िल्म के चर्मोत्कर्श में यही दृश्य देखला मिलता है कि अलाउद्दीन पागल हवशी समान रानी के लिए बिलख रहा है लेकिन उसे तो रानी का दीदार भी नसीब नहीं होता ।

आजकल तो फिल्में सम्पूर्ण करने में संगणक अथवा कम्प्युटर का उप्योग किया जाता है और मानना पड़ेगा कि अंकीय या डिजिटल कला का फिल्म पदमावत एक उत्तम उदाहरण है । फ़िर भले ही वह डिजिटल घोडे हों या गाय, हाथी आदि; डिजिटल पाल्कियाँ हों, डिजिटल चित्तौड़ का किला या रण-भूमी की व्यक्तिगत लडाई आदि । संगणक ने इस चलचित्र को पूर्णत: प्रभावशाली बना दिया है । 

एक अंकीय कलाकार या “Digital Artist” ही पहचान सकता है कि कहाँ-कहाँ फ़िल्म में हरे अथवा नीले पर्दों का उपयोग हुआ है । प्रकाश कहाँ से और कैसे आ रहा है; खासकर आखिरी दृश्य में जब अलाउद्दिन और रतन सिन्ह तलवारबाज़ी कर रहे होते हैं तो उनके पीछे के सभी नज़ारे संगणक द्वारा निर्मित हैं । 
यदि आप इसे ध्यान से देखें तो ज्ञात होगा; और सबसे अच्छी बात यह लगी कि यहाँ पर कैमरा गोल घूम रहा है और जब घूमते हुए प्रकाश की ओर से सीन लेता है तो कैमरे की परछाई को कम्प्युटर द्वारा मिटाया गया है... यह काबिल-ए-तारीफ़ है । यद्यपि ऐसा ना करने पर रेत पर कैमरामैन और कैमरे की परछाई अवश्य ही दिखाई पड़ती । तो इस प्रकार इस फिल्म में कई दृश्यों में संगणक उपयोग में लिया गया है । 

संजय जी ने कितना ध्यान लगा कर इस फिल्म को तराशा है यह साफ़ दिखाई पडता है । कम्प्युटर का सदुपयोग कोई इनकी वी.एफ.एक्स टीम से सीखे कि कैसे मुम्बई फिल्म सिटी के एक सेट को राजस्थान बना दिया या जहाँ कुछ नहीं केवल एक हरा परदा था वहाँ आखिरी दृश्य में शाहिद कपूर के पीछे चित्तोड़गढ बना दिया, यह कोई जादू से कम नहीं । 
बस एक छोटी सी मामुली सी ग़लती मुझे दिखाई दी वह यह कि हर जगह संजय जी ने प्रकाश को प्राकृतिक रखाअग्नि का; किन्तु कहीं-कहीं उन्होंने रात्रि के दृश्यों में static white light’ का उपयोग किया है और अंत में रतन और खिल्जी की लडाई में सूर्य का प्रकाश है, जिसका अर्थ है कि रोशनी का एक ही स्रोत है लेकिन यहाँ दो परछाइयां नज़र आती हैं (यानि २ दुनि = ४), जिसका निष्कर्श  यह निकल्ता है कि यह २ बड़ी स्टूडिओ लाइट्स हैं । कैमरे की परछाई को तो मिटा दिया किंतु अभिनेताओं की दो परछाइओं को एक नहीं कर पाया संगणक । बहुत ही केंद्रित दृष्टी से देखने पर यह दिखाई देता है ।

यदि संगीत कि बात की जाए तो, संजय जी ने फिल्म के अनुसार बहुत ही सरल एवं स्पष्ट शास्र्तिय संगीत का स्वर प्रदान किया है । और जैसा कि मैंने प्रारम्भ में कहा था कि हर कलाकार की एक कार्यशैली होती है जो जड़ मूल से बदलती नहीं है । आप भंसाली जी कि पिछ्ली फिल्मों के गीत सुन लो , आप को स्वरों में एक समानता का एहसास होगा । संजय जी की फिल्मों का स्वर शास्र्तिय संगीत की पराकाष्ठा को चूमता है । परिप्रेक्ष्य संगीत पूर्ण चलचित्र की शोभा को कई गुणा बढाता है । गीतों में मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि खलिबलि गीत को ज़बरदस्ती फ़िल्म में डाला गया है और इसकी कहीं भी आवश्यक्ता नहीं थी यदि कहानी कि ओर से देखें, किंतु यदि फिल्म में मनोरंजन भरने हेतु देखा जाए तो खलिबलि गाना सिर्फ़ और सिर्फ़ रणवीर सिन्ह की नृत्य कला को प्रदर्शित करने के लिए ही था और कुछ नहीं । 

यहां मैं एक बार फ़िर बाजीराव मस्तानी की बात करूंगा क्योंकि उस फिल्म का मल्हारी और पदमावत के खलिबलि गाने में विशेष समानताएं हैं । वही जोश, वही गोलाकार बना कर नाचना, वही ऊर्जा के साथ और यहाँ तक कि वही ग्रुप डांसर्स का होना इन दोनों गीतों को जोड़्ता है । बस एक बात नहीं समझ आई कि खलिबलि में अलाउद्दीन के अलावा बाकी सभी के पांव में कोई जूते क्यों नहीं हैं? 
दूसरा गाना बिंते दिल भी ठीक था; शायद यह अलाउद्दीन का चरित्र दर्शाने हेतु हो... हो सकता है । शेष सभी गीत एक दिल है एक जान’, घूमर और होरी आई रे...’, सभी बहुत ही ध्यानापूर्वक अंगभूत किए गए हैं और बहुत प्रसिद्ध हो चुके हैं । छठा गाना जो रिकार्ड हुआ लेकिन फिल्म में नहीं है वह है “नैनोंवाले ने...” । घूमर गाने में पुरुषों की अवाज़ भी है लेकिन फिल्म में कहीं भी वे दिखते नहीं और ना ही कोई वादन दिखता है ।

बाकी सभी तकनीकि क्षेत्रों में काम बहुत ही उत्तम व सटीक रहा है पदमावत में । निर्देशन विभाग, छायांकन विभाग, सम्वाद लेखन , अभिनेताओंं आदि सभी व्यक्तिओं ने अपना कार्यभार पूर्ण समर्पण और ईमानदारी से निभाया है । रणवीर के काम की विषेशरूप से सराहना की गई है ।

हर भारतीय को एक बार तो इस चलचित्र का आनंद अवश्य ही लेना चाहिए और हो सके तो त्री-आयामी (3D) स्वरूप में।

अंत मे कहना चाहुँगा, कि जो भी इस फिल्म का बेमतलब विरोध कर रहे थे, वे यह नहीं सोच रहे थे कि पदमावत फिल्म से राजस्थान में पर्यटन को कितना लाभ होगा । अपने निजि कारणों को लेकर दुराचार करना सही नहीं है । इस व्यभिचार और धोखाधडी वाले ज़माने में जहाँ सत्य-प्रेम का मिलना कठिन मालूम पड़ता है वहीं फिल्म तो हमें सत्यता, उसूल, आत्म-सम्मान, पवित्रता और अपने प्रियतम से वफ़ादार रहना एवँ सत्य-प्रेम की परिभाषा सिखाती है ।


धन्यवाद
ऋ.ब
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