Sunday, 18 March 2018

रेड - चलचित्र समीक्षा

ऋषी बब्बर द्वारा लिखित | १८ मार्च २०१८
RAID - अंग्रेज़ी शब्द रेड अथवा छापा :16 मार्च 2018 को प्रदर्शित काले-धन पर आधारित चलचित्र, जो रितेश शाह द्वारा लिखित है और राजकुमार गुप्त द्वारा निर्देशित है; इसमें मुख्यत: अजय देवगन और सौरभ शुक्ल हैं और इन दोनों ने तो परदे पर सहज रूप से कमाल कर दिखाया है । सभी ने फिल्म पर जो मेहनत की है उसका मैं पूर्ण हृदय से सम्मान करता हूँ । 
यह फिल्म 1981 में भारतीय राजस्व सेवा द्वारा आयोजित आयकर विभाग द्वारा डाले गए छापों की सच्ची घट्ना से प्रेरित है। अनाज की बोरियों, गुप्त सुरंगों, फर्श, सीढि‌, दीवारें तथा छतों में दबा हुआ लूट का धन किस प्रकार समक्ष आता है, यह सिनेमा के परदे पर छायांकित होता है । इस फिल्म के चर्मोत्कर्श में आँखें खुल जातीं हैं और बुद्धी में यह चेतना जागती है कि कैसे विमुद्रीकरण तथा डिजिटाइज़ेशन से देश को लाभ हुआ है जो सीधा-सीधा दिखाई नहीं पड़ता । भारतवासी जितना शीघ्र इस बात को मस्तिष्क में बिठा लें उतना अच्छा । एक प्रकार से यह फिल्म लोगों को शिक्षित भी करती है, मुख्यत: उन भोले-भाले लोगों को जिन्हें आज भ्रष्टाचार के कारणवश अनेक अनावश्यक कष्टों को झेलना पड़ रहा है ।

रेड चलचित्र के पात्रवर्ग कुछ इस प्रकार हैं:- अमेय पटनायक (अजय देवगन), मालिनी पटनायक (इलियाना डी'क्रूज़), रामेश्वर सिन्ह उर्फ़ ​​ताउजी उर्फ़ राजाजी (सौरभ शुक्ल), मुक्ता यादव (गायत्री अय्यर), अम्मा जी (पुष्पा जोशी), प्रभा देवी (शीबा चद्द्ढा), तारा (सुलग्ना पनिग्रही), लल्लन सुधीर (अमित सिआल), आदि ।
फिल्म का संगीत दिया है अमित त्रिवेदी और तनिश्क बाग्ची ने तथा अल्फोंस रोय द्वारा छायांकित है । गीतों को बोल दिए हैं मनोज मुंतशिर एवं इंद्रनील ने और कहना पड़ेगा कि मनोज जी का सानु इक पल चैन... गीत अत्याधिक प्रचलित हो चुका है । मनोज मुंतशिर, तनिश्क बाग्ची और राहत फतेह अलि खाँ साहब का मिश्रण इस गीत को अतिमीठा बना देता है । वैसे तो सानु इक पल चैन... और नित खैर मंगाँ... नुस्रत फ़तह अलि खाँ साहब के हैं जिसे उनके सुपुत्र राहत जी ने बखूबी गाया है । बाकी दो गीत झुक ना पाउंगा... और सारा का सारा है ब्लैक... ब्लैक... गीत भी फिल्म में पूर्णत: उप्युक्त बैठते हैं । इस चलचित्र को खासकर लखनऊ और राय बरेली में फिल्माया गया है । फिल्म के गीतों में दर्शकों को हुसैनाबाद घंटा घर, रूमी दर्वाज़ा, इमाम्बाडा, आदि जगाएँ देखने मिलतीं हैं । परिप्रेक्ष्य संगीत पूर्ण चलचित्र में बिलकुल सहज और सुल्झा हुआ है ।
निर्देशक के रूप में राजकुमार गुप्त जी की यह चौथी फ़िल्म है जिसमें उन्होंने अपना अब तक का उत्तम कार्य किया है जो कि परदे पर दृश्यमान होता है । बोधादित्य  बैनर्जी का संपादन भी प्रथम श्रेणीका है । ऐसी सुल्झी हुई उत्तम श्रेणी की साफ़ सुथरी फिल्म बनाने के लिए रितेश जी और राजकुमार जी को मेरा शत्-शत् नमन् ।
सारांश में कहाँनी कुछ इस प्रकार है कि आयकर विभाग अधिकारी अमेय पटनायक जो कि एक निष्कपट व्यक्ति हैं, जिन्हें कोई गुमनाम आदमी दूर्भाष तथा ख़तों द्वारा सूचित करता है कि उसे किसी नेता के पास, करीब 420 करोड़ रुपए का काला-धन होने की सूचना है और वह अंजान बंदा अमेय को सूचित करने में मदद करता है । वह व्यक्ति अमेय को उस नेता के घर का नक्षा तक प्रदान करता है; और बाकि मदद ताउजी की अम्मा जी अथवा दादी माँ अंजाने में कर देतीं हैं । बहुत ही हसने योग्य दृश्य है वह जब अम्मा जी कहतीं हैं, “सारे घर के वास्तु का सत्यानाश कर दिया ...” । अमेय अपनी पत्नी मालिनी सहित कई बार घर बदल चुके हैं क्योंकि अमेय का उनकी निष्कपटता के चलते 49 बार तबाद्ला हो चुका है । उस अज्ञात व्यक्ति के कहे अनुसार अमेय जब पूर्णत: संतुष्ट हो जाते हैं कि ताउजी के पास करोडों का काला धन है, तब वे आयकर विभाग तथा केंद्र भारत सरकार से अनुमती लिए रामेश्वर सिंह के बंगले पर धावा बोलते हैं । 

कानूनी रूप से  सभी औपचारिक्ताओं के अनुकूल छापा कैसे मारा जाता है यह सिनेमा के परदे पर देखना बहुत ही रोमंचकारी बन जाता है, खासकर इस फिल्म में । ताउजी की धम्किओं के बावजूद अमेय निडर्तापूर्वक अपने कर्तव्य का सम्पूर्णत: निर्वाहन करते हैं । कई घंटों की असफ़ल्ता के पश्चात अमेय को नोटों की गढ्ढी नकली दीवार को तोड़ने पर मिलते हैं । उसके उपरांत एक दृश्य में जब ताउजी अपनी बंदूक ले आते हैं तो ग़लती से एक गोली नक्ली छत पर चल जाती है और उसमें से सोने के बिस्कुट बरसने लगते हैं । इस दृश्य के परदे पर आते ही दर्शकों का उत्साह कहाँनी के प्रती और अधिक बढ़ जाता है । 

कई दिनों तक चलने वाली इस छापेमारी में ताउजी इसे रोकने हेतु प्रधानमंत्री महोदया तक पहुँच जाते हैं, किंतु कुछ नहीं कर पाते । यहाँ तक की अमेय की पत्नी मालिनी को भी हानी पहुचाने की सोचते हैं किन्तु मालिनी  की जान बच जाती है । फ़िर हार कर ताउजी आख़री हथकंडा अपनाते हैं और आस-पड़ोस के गाँव वालों को (राजाजी की फौज) एकत्रित कर लेते हैं इस उम्मीद पर की अमेय को वे धन सहित अपने बंगले से जाने नहीं देंगे, किंतु एक बार फ़िर निशफल होते हैं क्योंकि आयकर टोली के अन्य सदस्यों को अमेय सुरक्षित बंगले से भगाने में सफल हो जाता है जैसा की उसने प्रारम्भ में अपने वरिष्ठ अधिकारी को वचन दिया था; और वे जाकर सेना को ले आते हैं और अमेय की जान बच जाती है । अंत में रमेश्वर उर्फ़ ताउजी को जेल हो जाती है और वह जेल में बैठे यही सोचता रह जाता है कि अंतत: भेद अभेद किया किसने । आख़िर वह राज़दार था कौन, घर का भेदी था कौन ? क्या वह परिवार का कोई सदस्य था याँ कोई और ?
इसमें मनोरंजन और देशभक्ति की भावना है, जिसे मल्टीप्लेक्स और अन्य छोटे-सिनेमाघरों के दर्शकों द्वारा एक जैसे प्यार मिलेगा । हर भारतीय को एक बार तो इस चलचित्र को अवश्य ही देखना चाहिए । ऐसी फिल्में हमारे देश में और अधिक बननी चाहिए जो आम जन मानस को शिक्षित भी करें अथवा मनोरंजन भी प्रदान करें । मेरी इस समीक्षा को पूर्ण पड़ने हेतु आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ।


ऋषी बब्बर
मुम्बई, भारत
-------
--------------

No comments:

Post a Comment

Bahubali - The Vegetarian

Vegan Bahubali LEARN MORE ABOUT VEGETARIANISM HERE : 1. http://spiritualdatabase.blogspot.in/2015/02/great-quotations-on-vegetarianism...