Friday, 13 April 2018

बागी २ - चलचित्र समीक्षा


ऋषीबब्बर द्वारा लिखित | १३ अप्रैल २०१८

बागी २ चलचित्र ३० मार्च २०१८ से सिनेमा घरों में प्रदर्शित है और खुशी की बात है कि इस फ़िल्म ने अपने उत्पाद के मूल्य से ४ गुणा से भी ज़्यादा कमा लिया है । 


दुनिया भर में कुल ४१२५ पर्दों पर प्रदर्शित यह फ़िल्म अहमद खाँ द्वारा निर्देशित है एवं अदिवि सेश द्वारा लिखित है (तेलुगु फ़िल्म क्षनम - २०१६) , जिसका हिंदी रूपांतरण लिखा है साजिद नाडियाड्वाला ने । 
इसमें मुख्यत: टाइगर श्रौफ़, दिशा पाट्नी और मनोज बाजपई हैं । टाइगर ने इस जुझारू फिल्म में जो अव्वल दर्जे की मेहनत की है उसका मैं पूर्ण हृदय से आदर करता हूँ ।
बागी २ चलचित्र के पात्रवर्ग इस प्रकार हैं:- रण्वीर प्रताप सिन्ह (टाइगर श्रौफ़), नेहा (दिशा पाट्नी), सन्नी (प्रतीक बब्बर), शेर्गिल (मनोज बाज्पई), शेखर (दर्शन कुमार), ए.सी.पी - एल.एस.डी (रण्दीप हूडा), उस्मान लंग्डा (दीपक डोब्रियाल), आदि ।
गीतों का संगीत दिया है मिथुन, अर्को प्रावो मुखर्जी, संदीप शिरोड्कर, गौरव-रोशिन,प्रणय रिजय ने । कुछ गीत जैसे कि ओ साथी..., लो सफ़र शुरु हो गय... फिल्म में पूर्णत: उप्युक्त बैठते हैं किंतु दूसरी ओर कुछ पुन:निर्मित गीत जैसे कि एक दो तीन... और मुंडेयाँ तों बचके रईं ... कुछ बराबर नहीं बहते फ़िल्म के साथ; मानो इन्हें ज़बर्दस्ती फ़िल्म में डाला गया हो । जैक्लीन ने बहुत कोशिश की किंतु माधुरी जी जैसा नूर जागृत नहीं कर पाईं ।  इस चलचित्र को मुम्बई, पुणे, मनाली, थाइलैंड, चीन, गोआ और लद्दाख में फिल्माया गया है । जुलियस पाकिआम का परिप्रेक्ष्य संगीत पूर्ण चलचित्र में बिलकुल ही सटीक है; और सुधार किया जा सकता था । फिल्म के दृश्य संताना कृशनन द्वारा छायांकित हैं ।
निर्देशक के रूप में अहमद जी ने उत्तम कार्य किया है जो कि परदे पर दृश्यमान होता है । रामेश्वर भगत का संपादन भी अच्छा है । ऐसी उत्तम श्रेणी की जुझारू फिल्म देखने से यह ज्ञात होता है कि हिंदी चलचित्र उद्योग को टाइगर श्रौफ़ के रूप में एक नया ऊर्जावान अभिनेता मिला है जो पिछ्ले खिलाडियों का भी खिलाडी प्रतीत होता है ।

सारांश में कहाँनी कुछ इस प्रकार है कि रण्वीर प्रताप सिन्ह उर्फ़ रौनी एक सेना के कप्तान हैं जिन्हें एक दिन उन्की प्रेमिका नेहा का संदेश मिलता है ज़रूरी मदद हेतु । रौनी गोआ पहुँचता है नेहा से मिलता है और तब उसे ज्ञात होता है कि नेहा की एक बेटी है रिया जिसका अपहरण हो चुका है । 
पुलिस वाले भी कुछ नहीं करते इस बारे में । नेहा के पास रिया की केवल एक ही छोटीसी तस्वीर होती है । रौनी उसे पूछ्ता है कि रिया की और फोटो दे लेकिन नेहा कहती है कि इस एक फोटो के इलावा और कुछ नहीं है उसके पास , यह जान कर रौनी हैरान रह जाता है । 
रौनी रिया की ख़ोज में निकलता है और नेहा के साथ पुलिस चौंकी पहुचता है । लेकिन वहाँ पहुंच कर दारोगा शरद कुटे का कुवयव्हार देख पुलिसवालों की ही धुलाई कर देता है, किंतु तिरंगे ध्वज को फ़र्श पर गिरने नहीं देता । 
इस बीच डी.आई.जी अजय शेर्गिल भी रौनी से मिलते हैं । गोआ में भ्रमण हेतु रौनी एक गाडी किराए पर लेता है उस्मान भाई गाडीवाले से 
लेकिन शीघ्र ही उसे ज्ञात होता है कि उस्मान भाई का नेहा के देवर सन्नी, जोकि एक ड्रग डीलर है, से कोई सम्बंध है । 
रौनी नेहा के पती शेखर से भी मिलता है जो उसे बताता है कि नेहा की कोई संतान थी ही नहीं ; बस उसका एक भ्रम था । रौनी जब नेहा से यह बात करता है तो नेहा की बात पर भरोसा ना करने कारणवश नेहा अपने प्राणों की आहुति दे देती है । 
अब नेहा सच कह रही है यां शेखर? क्या सच में रिया है यां नहीं ? अंत में हक़ीकत क्या है ? फिल्म की शुरुआत थोडी ढीली होती है जो अंत में ज़ोर पकड्ती है । फ़िल्म के चर्मोत्कर्श में टाइगर का एक्शन देखते ही बनता है । टाइगर श्रौफ़ को मेरा सलाम् ।
पूर्ण्त: देखा जाए तो निर्देशन, कहाँनी, सम्वाद और लेखन और अधिक बहतर हो सकता था लेकिन अंत में टाइगर ने ही इस फ़िल्म को सफ़लता दिलाई है । दिशा का सम्वाद का ढंग इतना प्रभावशाली नहीं रहा है जितना की होना चाहिए था, एक एक्शन हीरो के समक्ष ।
इस फ़िल्म में एक्शन के साथ-साथ देशभक्ति की भावना है, जिसे सभी दर्शकों ने सराहा है। मेरे हिसाब से यह फ़िल्म एक बार देखने योग्य तो है ही । इस चलचित्र से यह सीख तो अवश्य ही मिलती है कि देश को हाँनी पहुंचाने वाले केवल सीमा पार ही नहीं बल्की देश के भीतर और यहाँ तक कि पुलिस की वर्दी पहनने वाले भी होते हैं । जिन्हें ठीकाने लगाने हेतु फौजियों को कभी-कभी देश के भीतर भी घूम लेना चाहिए ।
जय-हिंद ।
अंत तक इस फ़िल्म समीक्षा को पढ़ने हेतु पाठक का बहुत-बहुत धन्यवाद ।
ऋ.ब
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