Tuesday, 29 May 2018

परमाणु - चलचित्र समीक्षा

ऋषीबब्बर द्वारा लिखित | २९ मई २०१८
“वंदे-मातरम्”
“अति उत्तम चलचित्रम्” ...
“भारत-माता की जय” ...

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परमाणु फ़िल्म देखने पश्चात कुछ ऐसी ही अनुभूति होती है। फ़िल्म के चर्मोत्कर्श में दर्शक के चेहरे पर मुस्कान, आंखों में आंसु, दिल में देशभक्ति अथवा तालिओं की गड्गडाहट से सिनेमाघर गूंज उठता है ।
२५ माई २०१८ से सिनेमा घरों में प्रदर्शित यह फ़िल्म, पोखरण राजस्थान में, मई १९९८ में भारत द्वारा किए गए परमाणु परीक्षणों (पोखरण -२ या औपरेशन शक्ति) पर आधारित है ।

भारत में जो कोई और फ़िल्म-निर्माता कभी ऐसा सोचता भी नहीं, ऐसे विषय पर फ़िल्म बना कर अविश्वस्नीय कार्य कर दिखाया है जौन इब्राहिम ने, जोकि अतुल्य है । सामान्यत: यदि कोई फ़िल्म-निर्माता विचारे, तो वह फ़िल्म-निर्माण से पूर्व सोचेगा कि यह कोई रोमांचक विषय तो है नहीं; और इसलिए वह इसे टाल देता । 


किंतु अभिशेक शर्मा जी का निर्देशन एवं उपयुक्त संगीत और गीतों ने इस फ़िल्म को वह बनाया है जो आज हम सिनेमाघरों में बड़े गर्व से देख सकते हैं । निश्चित रूप से यह फ़िल्म राष्ट्रीय फ़िल्म पुरुस्कार की हक़दार है ।


अभिशेक शर्मा द्वारा निर्देशित यह फ़िल्म साइविन कुवादरस, सन्युक्ता चावला और खुद अभिशेक शर्मा द्वारा लिखित है। फ़िल्म के मधुर गीतों का संगीत दिया है सचिन-जिगर, जीत गांगुलि ने और परिप्रेक्ष्य संगीत दिया है संदीप चौटा ने। फ़िल्म का एक गीत थारे वास्ते रे... फ़िल्म में पूर्णत: उप्युक्त बैठता है एवं अति मधुर है और मुझे अत्यंत ही प्रीय है । 



अन्य गीत भी अच्छे हैं जोकि परिप्रेक्ष्य में हैं ।


परमाणु का निर्देशन, छायांकन, कहाँनी, सम्वाद और लेखन बिल्कुल ही उपयुक्त बैठते हैं । प्रारम्भ में फ़िल्म की कहाँनी थोड़ी सी धीमी होती है, किंतु बाद में गति पकड़ लेती है । इस चलचित्र को मुम्बई, दिल्ली, पोखरण , पोखरण  किला, आडा बज़ार, गांधी चौंक बज़ार और गोमत रेल्वे स्टेशन पर फिल्माया गया है । 


फ़िल्म के दृश्य असीम मिश्र एवं ज़ुबिन मिस्त्रि द्वारा छायांकित हैं अथवा रामेश्वर भगत का सम्पादन बिलकुल ही तीक्षण है। परमाणु के निर्माण में कुल रूपए ५० कोटि की पूंजी क्षय हुई है । फ़िल्म का छायांकन मई २०१७  से अगस्त २०१७ तक हुआ ।

परमाणु चलचित्र के पात्रवर्ग इस प्रकार हैं:-
जौन इब्राहिम – अश्वत रैना
डाएना पेंटी – अम्बालिका बंदोपाध्यय
बोमन इरानी – हिमांशु शुक्ल (प्रधानमंत्री अ. बि. वाजपयी के सचिव)
अदित्य हित्कारी –डाक्टर विरफ़ वाडिआ
विकास कुमार – मेजर प्रेम
योगेंद्र टिकु – डाक्टर नरेश सिन्हा
अ‍ॅनुजा साठे – सुश्मा रैना
अजय शंकर – पुरु रंगनाथन
दर्शन पंड्या -  पकिस्तानी जासूस
मार्क बेनिंग्टन – डैनिअल (अमेरिकि जासूस / वैज्ञानिक)
आदि... ।


सारांश में कहाँनी कुछ इस प्रकार है – सन् १९९५ , अश्वत रैना एक आई.ए.एस अधिकारी है, जो चाहता है कि भारत परमाणु ऊर्जा में निपुण बने, किंतु उसके वरिष्ठ सहयोगी अश्वथ के इस विचार को चुट्कुला मानते हैं। 


इन्हीं वरिष्ठ अधिकारियों में से एक अश्वत के इस ख्याल को चुरा कर, बिना पूरी योजना जाने, अश्वत के बिना ही प्रधान मंत्री को प्रस्तुत करता है। प्रधान मंत्री से मंज़ूरी मिलने के बाद, पोखरण में कार्य आरंभ होता है, लेकिन क्योंकि इस बात में कुछ खोट या अधूरापन होता है, नियोग निस्फ़ल हो जाता है । इससे भी बुरा, अश्वत को जिम्मेदार ठहराया जाता है और नौकरी से निलंबित कर दिया जाता है। सच तो यह था कि निस्फ़ल्ता एक दोषपूर्ण योजना के कारण नहीं, बल्कि अश्वत की योजना को पूर्ण रूप से पढ़े‌ बिना करने में थी।


फ़िर कुछ वर्ष उपरांत १९९८ में, प्रधानमंत्री के नए मुख्य सचिव हिमांशु शुक्ल, अश्वत को फिर से नियुक्त करते हैं ताकि पोखरण में परमाणु नियोग को पुन: आरम्भ किया जा सके । कोड्नेम कृष्ण लेते हुए अश्वत अपने पांच पांडवों के साथ - यानी विभिन्न क्षेत्रों से पांच सफल व्यक्तियों के संग – 


भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र से डॉ. विराफ वाडिया (कोड्नेम - युधिष्ठिर), फ़ौज से मेजर प्रेम (कोड्नेम - भीम), अव्वल वैज्ञानिक डॉ. नरेश सिन्हा (कोड्नेम - अर्जुन), भारतीय स्पेस एजेंसी से पुरु रंगनाथन (कोड्नेम - सहदेव) और इंटेलिजेंस से अम्बालिका (कोड्नेम - नकुल) - भारत के पहले परमाणु बम बनाने में उसकी मदद करते हैं ।

यह एक गुप्त ऑपरेशन है, इसलिए समूह केवल रात्रि में उस दौरान काम करता है जब आकाश में कोई अमेरिकि उपग्रह भारत पर नहीं मडरा रहा होता। सहदेव उपग्रह पर नज़र रखते हैं जबकि अन्य लोग  मैदान में जुटे होते हैं।

पोखरण में एक पाकिस्तानी जासूस, जो एक अमेरिकी वैज्ञानिक/जासूस के साथ मिलकर काम करता है; जल्द ही उसे एहसास होता है कि पोखरण में कोई गंभीर गतिविधि चल रही है और अमेरिकी जासूस इस बारे में अमेरिका में सी.आई.ए को सूचित करता है; किंतु वे इसकी बात को गम्भीरता से नहीं लेते । 


पाकिस्तानी जासूस अश्वत और उसकी पत्नी की दूर्ध्वनी यंत्र पर चल रहीं बातें सुन लेता है और जान जाता है कि इसका असल नाम कृष्ण नहीं बल्की अश्वत है और उसके होटल के कमरे में खूफ़िया ध्वनीकैद यंत्र लगा देता है कि जिससे वह सभी बातें सुन सके । इसी प्रकार अमेरिकि जासूस को भी ज्ञात हो जाता है कि सच्चाई कुछ और है । 


इस समय पर अश्वत और उसके समूह में भी सभी को ज्ञात हो जाता है की एक से ज़्यादा अमेरिकि उपग्रह उन पर नज़र रखे हुए है । अब आगे क्या होता है इसका वर्णन यहा करना उचित नहीं होगा । 


अश्वत रैना सभी बाधाओं के खिलाफ कैसे सफल होता है और आखिरकार भारत में सफ़ल परमाणु परीक्षण होता है, यही इस फ़िल्म को देखने का स्वाद भी है और रहस्य भी। चर्मोत्कर्श में तो मानो जैसे सिनेमा हौल में ही बम फटे होंं, बड़ा ही रोमांचक दृश्य है वह । 


मई १९९८ के इन परमाणु परीक्षणों के पश्चात भारत को एक परमाणु सक्षम राज्य के रूप में मान्यता मिली।



दर्शकों को इसका और भी लुफ़्त आता है क्योंकि फ़िल्म में अमेरिकिओं को हमारा हीरो कृष्ण, मूर्ख बनाता है । लेखन का सबसे अच्छा हिस्सा यह है कि आपको कृष्ण और उसके समूह से जोड़े रखता है। 


इसके अलावा, इस नाटक में ऐसे ध्यान आकर्शित करने वाले क्षण भी हैं कि दर्शक बिना पल्कें झप्काए देखते व सोचते रहते हैं कि,  अब क्या होगाअब क्या होगा - यह कैसे होगापरमाणु चलचित्र में सभी कलाकारों ने उत्कृष्ट कार्य का नमूना दिया है।



इस फ़िल्म में देशभक्ति की भावना बहुत गहराई में छुपी हुई है, जिसे सभी दर्शकों ने सराहा है।
मैं अपने सह-देश्वासियों से आग्रह करूंगा कि यदि आप अपनेआपको भारतीय कहल्वाने का गौरव महसूस करना चाहते हैं, तो आपके लिए परमाणु फ़िल्म सिनेमाघर में देखना तो अनिवार्य है ही, भले ही कुछ और देखें ना देखें । 



जय-हिंद ।
वंदे-मातरम् ।



इस समीक्षा को पूर्ण पढ़ने हेतु पाठक को मेरा असीम धन्यवाद ।

ऋषीबब्बर.भारत
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