Thursday, 18 October 2018

दस्सेहरे का सच

दस्सेहरे का  त्योहार प्रतीकात्मक है । 
यह इस बात का प्रमाण है कि केवल शास्त्रों को 

तोते की भांति रट्ने से हमारी आत्मा की अध्यात्मिक उन्नति नहीं होती ।
दस दिमागों जितना ज्ञान रावण में था , चारों वेदों का टिकाकार भी था
किंतु क्या अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण कर पाया

इसका विपरीत हुआ जब उसने सीता का अपहरण किया ।
इसलिए ही तो उसका पुत्ला प्रति वर्ष हम जलाते हैं ।
तो इसका अर्थ हुआ कि जब तक हम शास्त्रों का ज्ञान अपने जीवन में लागू नहीं करते, हमारी समस्याओं का अंत नहीं हो सकता ।
एक और बात याद रखनी चाहिए कि सब वेदों-किताबों को सत्गुरुओं ने लिखा था ।
हर किताब कहती है कि सच्चे गुरु बिना कुछ नहीं।
दुनिया भर की पुस्तकें क्यों ना हों घर में
यदि सत्गुरु की शरण में नहीं गए हम, तो कौड़ी काम की नहीं।
वही रावण वाला हाल ...... क्या फायदा ....?

-ऋषि बब्बर , १८ अक्टूबर २०१८, मुम्बई , भारत





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